chant for change

जुलाई १७ और १८ को इस्कॉन (ISKCON) और चारों वैष्णव संप्रदायों के आध्यात्मिक नेता एवं सदस्य, अंतरराष्ट्रीय कीर्तन उत्सव “परिवर्तन के लिए हरिनाम” के दौरान पवित्र नामों का जप करने के लिए एकजुट हो रहे हैं।

दुनिया के सभी धर्मों में पवित्र नामों के जप की प्रक्रिया एक समान विश्वास है। इस उत्सव का उद्देश्य भगवान के नाम के जप के द्वारा विभिन्न जातियों, धर्मों और देशों के लोगों को एक साथ लाना है।

इस्कॉन के साथ सभी वैष्णव संप्रदाय, जो हैं ; श्रीमती लक्ष्मीदेवी से निकला, ‘श्री’ सम्प्रदाय; वल्लभ सम्प्रदाय जो भगवान शिव से आता है ; निम्बार्क सम्प्रदाय जो चार कुमारों से आता है और ब्रह्मा जी से निकला मध्व सम्प्रदाय, सहयोग कर रहे हैं ।

इस्कॉन स्वयं भी, मध्व सम्प्रदाय की कई शाखाओं में से एक, 16 वीं शताब्दी में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा स्थापित ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय संप्रदाय के अंतर्गत आता है। संचालको में से एक निखिल कोटियन कहते हैं, “हम इस्कॉन इसलिए कहते हैं क्योंकि यह सबसे प्रमुख एवं विश्व विख्यात वैष्णव संप्रदाय है। और यह हरिनाम बस इन्हीं सम्प्रद्रयों तक ही सिमित नहीं है सबके लिए है, हर कृष्ण या विष्णु मंदिर में ६-१२ घंटो का हरिनाम कीर्तन होना चाहिए ।

निखिल(संचालक) कहते हैं, “हर वैष्णव को हरिनाम की महिमा पता है। यह सब पर सकारात्मक प्रभाव डालता है । इसलिए हम विश्व के हर कोने को हरिनाम से आप्लावित कर देना चाहते हैं। ग्लोबल वार्मिंग, लालच, आतंकवाद आदि की वजह से बड़ी ही नकारात्मक स्थिति बनी हुयी है। आज नहीं तो कल हरिनाम अपना प्रभाव दिखायेगा और हम वो परिवर्तन अवश्य देखेंगे।”

चारों सम्प्रदायों के साथ हरिनाम संकीर्तन के इस उत्सव को लेकर इस्कॉन के भक्तो के बीच बड़ा ही उत्साह है। वे अभी से इस उत्सव के द्वारा अगले वर्ष (२०१६) इस्कॉन की ५०वीं वर्षगाँठ में हर संप्रदाय को जोड़ने की सोच रहे हैं।

——– ISKCON Desire Tree – हिंदी ——-