अल्प बुद्धि तथा कम आयु वाले आलसी मनुष्य रात को सोने में तथा दिन को व्यर्थके कार्यो में बिता देते हैं (श्रीमद् भागवतम 1.16.9) | जो लोग भौतिकतावादी जीवन के प्रति आसक्त होते हैं और आध्यात्मिक जीवन के प्रति अन्धे बने रहते हैं, अपने कर्मों की क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधLazy sleeping man जाते हैं (चै. च. अन्त्य लीला 6.199) | मनुष्य कभी भी कर्म का त्याग नहीं कर सकता क्योकि शरीर निर्वाह के लिए कर्म करना जरूरी है | राजा पृथू कहते हैं: “हे भगवान, आपकी माया के कारण इस भौतिक जगत के सभी प्राणी अपनी वास्तविक स्वाभाविक  स्थिति भूल गए हैं और वे अज्ञानवश समाज, मित्रता तथा प्रेम के रूप में निरंतर भौतिक सुख की कामना करते हैं” (श्रीमद् भागवतम 4.20.31) |  जो तथाकथित सुन्दर जीवन अर्थात संतान व स्त्री में फंस कर गृहस्थ के रूप में रहने तथा संपत्ति के पीछे लगे रहने में ही रूचि रखते हैं, वे इन्हीवस्तुओं को जीवन का परम लक्ष्य मान बैठते हैं | ऐसे लोग जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त किये बिना इस जगत में ही विभिन्न देहों में घूमते रहते हैं (श्रीमद् भागवतम 4.25.6) | अपने पूर्व-कर्मो तथा देवी व्यवस्था के कारण हम हम सकाम कर्मो के जाल में फँसे हुए हैं और हमारा जीवन-लक्ष्य ओझल हो चुका है, जिसके कारण हम इस ब्रह्मांड में भटक रहे हैं (श्रीमद् भागवतम 4.21.51) |

श्री अक्रूरमहाराज धृतराष्ट्र को समझाते हैं कि “इस जगत में किसी का किसी अन्य से कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं है | हम अपने ही शरीर के साथ जब सदा के लिए नहीं रह सकते तो फिर हमारी पत्नी, संतान तथा अन्यों के लिए क्या कहा जा सकता है | हर प्राणी अकेला उत्पन्न होता है और अकेला ही मरता है” (श्रीमद् भागवत 10.49.20-21) | श्रीमद् भागवत में भगवान ऋषभदेव कहते हैं: “जब पूर्व कर्म-फलों के कारण भौतिक जीवन में फँसे हुए व्यक्ति के हृदय की गांठ ढीली पड़ जाती है, तो वह घर, पत्नी तथा संतान के प्रति अपनी आसक्ति से विमुख होने लगता है | इस तरह उसका मोह टूट जाता है,वह मुक्त हो जाता है और उसे दिव्य लोक की प्राप्ति होती है” (श्रीमद् भागवत 5.5.9) |  

बलि महाराज भगवान वामन देव को आत्म समर्पण करते हुए कहते हैं: “उस भौतिक शरीर का क्या लाभ जो जीवन के अन्त में अपने स्वामी को स्वतः छोड़ देता है? परिवार के उन सभी सदस्यों से क्या लाभ जो वास्तव में उस धन का अपहरण कर लेते हैं, जो भगवान की सेवा में उपयोगी हो सकता है ? उस पत्नी से भी क्या लाभ जो भौतिक दशाओं को बढाने की श्रोत मात्र है? उस घर, परिवार, देश, तथा जाति से भी क्या लाभ जिसमे आसक्त होने से सारेThe attached Family Man जीवन का विनाश हो जाता है” (श्रीमद् भागवतम 8.22.9) | श्रीमद् भागवतम (2.1.3) के अनुसार ईर्ष्यालु गृहस्थ (गृहमेधी) का जीवन रात्रि में या तो सोने या मैथुन में रत रहने तथा दिन में धन कमाने या परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण में बीतता है | हम भी इसी प्रकार अपने अमूल्य जीवन को नष्ट किये जा रहें हैं |

गीता (13.23) के अनुसार इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है, जो ईश्वर हैं, परम स्वामी हैं और साक्षी तथा अनुमति देने वाले के रूप में विद्धमान हैं और जो परमात्मा कहलाता है | जीव कर्मो का फल भोगता है, जबकि भगवान परमात्मा के रूप में ऐसे कर्म के साक्षी मात्र होते हैं और फल प्रदान करते हैं | “जो स्वत: होने वाले लाभ से संतुष्ट रहता है, जो सफलता तथा असफलता दोनों में स्थिर रहता है, वह कर्म करता हुआ भी कभी बंधता नहीं है” (भगवद-गीता  4.22) | जो भगवान कृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध को जानते हुए कर्म करता है, उसे मृत्यु के पश्चात् अपने कर्म फलो का सुख-दुःख नहीं भोगना पड़ता |

नारदजी श्रीमद् भागवतम (1.5.32 & 34) में श्रील व्यासदेव को बताते हैं कि “समस्त कष्टों तथा दुखो के उपचार का सर्वोत्तम उपाय यह है कि अपने सारे कर्मो को भगवान (श्री कृष्ण) की सेवा में अर्पित कर दिया जाये ) | इस प्रकार जब मनुष्य के सारे कार्यकलाप भगवान की सेवा में समर्पित होते हैं, तो वही कर्म जो उसके शाश्वत बंधन के कारण होते हैं, कर्म रुपी वृक्ष के विनाश्कर्ता बन जाते हैं” |

गीता (5.10) के अनुसार जो व्यक्ति कर्म-फलों को परमेश्वर को समर्पित कर के आशक्ति रहित हो कर अपना कर्म करता है, वह पाप कर्मों से उसी प्रकार अप्रभावित रहता है जिस प्रकार कमल से जल | तथा (4.20) के अनुसार, अपने कर्म-फलों की सारी आसक्ति को त्याग कर सदैव संतुष्ट तथा स्वतंत्र रह कर व्यक्ति सभी प्रकार के कार्यों में व्यस्त रह कर भी कोई सकाम कर्म नहीं करता |

कर्म किये बिना कोई रह नहीं सकता | जो अपने कर्म-फल के प्रति अनासक्त है और जो अपने कर्तव्य का पालन करता है वही सन्यासी और असली योगी है | जब हम अपने कर्मों के फलों के प्रति अनासक्त रहते हैं तथा कर्तव्यनिष्ठ होते हुए अपने कार्यों को श्री कृष्ण को अर्पित करते हैं, तब हम कार्यों के अच्छे व बुरे परिणामों से मुक्त हो जाते हैं | सेना में कार्यरत एक सिपाही का उदाहरण लीजिये; युद्ध में विरोधी सिपाहियों की हत्या करने पर उसे कोई दंड नही मिलता क्योकि यह कार्य उसने देश के लिए किया है, बल्कि उसे पुरुस्कार भी मिलता है | लेकिन वही सिपाही जब देश में किसी अन्य व्यक्ति की हत्या कर देता है तो उसे कानून के अनुसार दंड मिलता है क्योकि यह कार्य उसने अपने लिए किया है |जब हम यह फर्क समझ जाते हैं तो इस प्रकार हम धीरे धीरे उस स्तर पर आ जाते हैं जहाँ हम केवल श्री कृष्ण की प्रसन्नता हेतु ही कर्म

Hare Krishna Family

एक कृष्ण-भक्त परिवार

करते हैं | इसे भक्ति योग या शुद्ध भक्ति कहा जाता है | भक्ति में लगे बिना केवल समस्त कर्मो का परित्याग करने से कोई सुखी नहीं बन सकता | जो लोग भगवान की भक्ति में रत हैं उनके सारे पापकर्म चाहे फलीभूत हो चुके हों, सामान्य हों या बीज रूप में हों क्रमशः नष्ट हो जाते हैं (पध्नपुराण) | श्रीमद् भागवतम (6.2.17) में विष्णुदूत यमदूतों को समझाते हुए कहते हैं: “यधिपि तपस्या, दान, व्रत तथा अन्य विधियों से पाप कर्म तथा उनके फल विनिष्ट हो जाते हैं किन्तु ये पुण्य-कर्म हृदय की भौतिक इच्छाओं का उन्मूलन नहीं कर सकते लेकिन यदि जीव भगवान के चरण कमलों की सेवा करता है तो तुरन्त ही इन कल्मषों से मुक्त हो जाता है” | 

श्रीमद् भागवतम (7.9.45) में प्रह्लाद महाराज कहते हैं: “विषयी जीवन की तुलना खुजली दूर करने हेतु दोनों हाथों के रगड़ने से की गई है | गृह-मेघी अर्थात वे गृहस्थ जिन्हें कोई आध्यात्मिक ज्ञान नही है,सोचते हैं कि यह खुजलाना सर्वोत्कृष्ट सुख है, वास्तव में तो यह दुख की जड़ है | वे बारम्बार इन्द्रिय भोग करने पर भी कभी तुष्ट नही होते किन्तु जो धीर हैं इस खुजलाहट को सह लेते हैं” | इसी प्रकार श्रीमद् भागवतम (9.19.14) में कहा गया है, “जिस तरह अग्नि में घी डालने से अग्नि शान्त नहीं होती अपितु अधिकाधिक बढती ही जाती है उसी प्रकार निरन्तर भोग द्वारा काम-इच्छाओं को रोकने का प्रयास कभी भी सफल नहीं हो सकता” | देहधारी  जीव इन्द्रियभोग से भले ही निर्वृत हो जाये पर उसमें इन्द्रिय भोगों की इच्छा बनी रहती है | लेकिन उत्तम रस (कृष्णभावनामृत) के अनुभव होने से ऐसे कार्यों को बंद करने पर वह भक्ति में स्थिर हो जाता है (भगवद-गीता 2.59) |

श्री कृष्ण गोपियों को समझाते हैं: जो लोग अपना मन मुझ पर टिका देते हैं उनकी इच्छा उन्हें भौतिक विषय-वासना की ओर नही ले जाती, जिस तरह धूप से झुलसे और फिर अग्नि में पकाए गए जौं के बीज नए अंकुर बन कर नही उग सकते ।  (श्रीमद् भागवतम 10.22.26) |

श्रीमद् भागवतम के अनुसार “धार्मिक कर्मो के अपराधी के लिये वही गति है जो उसे अपराधी के रूप में पहचान करने वाले की है | भगवान की इच्छा के बिना, न तो कोई हमारा उपकार कर सकता है, न ही हमें हानि पहुँचा सकता है | अपराधी की बुराई करने वाला भी अपराध कर्ता के ही समान पापी है | समस्त कारणों के अंतिम कारण श्री कृष्ण ही हैं” (श्रीमद् भागवतम 1.17.22) | क्योंकि प्रत्येक वस्तु भगवान की परम इच्छा पर निर्भर है अतः मनुष्य को यश-अपयश, हार-जीत तथा जीवन-मृत्यु में निश्चित होकर सम-भाव बनाये रखना चाहिये (श्रीमद् भागवतम  6.12.14) | हमें सुख या दुख, हानि या लाभ, विजय या पराजय का विचार किये बिना अपना नियत कर्म करना चाहियें (भगवद-गीता 2.38) | श्रीमद् भागवतम में नारदजी व्यासदेव को समझाते हैं कि जहाँ तक इन्द्रिय-भोग से प्राप्त होने वाले सुख की बात है, वह तो कालक्रम से स्वतः प्राप्त होता है जिस प्रकार हमारे न चाहने पर भी हमें दुख मिलते रहते हैं” (श्रीमद् भागवतम  1.5.18) | तथा नारदजी ध्रुव को समझाते हैं “मनुष्य को चाहिए कि जीवन की किसी भी अवस्था में,चाहे सुख हो या दुख, जो देवी इच्छा (भाग्य)  द्वारा प्रदत है संतुष्ट रहे | ऐसा व्यक्ति अज्ञान के अंधकार को बहुत सरलता से पार कर लेता है” (श्रीमद् भागवतम  4.8.33) |

मनुष्य जीवन अर्थदम अर्थात मूल्य प्रदान करने वाला है | जीवन का सबसे बड़ा मूल्य क्या है ? मनुष्य के स्वार्थ का लक्ष्य भगवत्प्रेम पाने व भगवद्-धाम वापस जाने का होना चाहिये | गधा अपना हित नहीं पहचानता और वह केवल दूसरों के लिए कठिन श्रम करता है तथा बिना किसी लाभ के भरी से भारी बोझ ढोता है | जो व्यक्ति मानव जीवन में उपलब्ध होने वाले अपने निजी हित (भक्ति) को भूल कर दूसरों के लिए ही कार्य करता है, वह गधे के ही समान है (श्रीमद् भागवतम 2.3.19 की व्याख्या ) |

जीव अनन्त काल से कृष्ण को भूल कर भौतिक प्रकृति द्वारा आकृष्ट होता रहा है, अतः माया उसे इस भौतिक संसार में सभी प्रकार के दु:ख देती रहती हैं (CC.मध्य लीला 20.117) | श्रीमद् भागवतम (10.14.8) में ब्रह्माजी भगवान कृष्ण की स्तुति करते हुए कहते हैं: “जो भगवान की अहैतुकी कृपा प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रतीक्षा करता है और भगवान को हृदय से सादर नमस्कार करता हुआ पूर्व दुष्कर्मों के फलों को भोगता रहता है, वह अवश्य ही मुक्ति का भागी है” | श्रीमद् भागवतम (8.12.6) में महादेव भगवान की प्रार्थना करते हुए कहते हैं: “जो व्यक्ति जीवन के चरम लक्ष्य प्राप्त करने के इच्छुक है तथा इन्द्रियतृप्ति की समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित है, वे भगवान के चरण-कमलों की निरन्तर भक्ति में लगे रहते हैं” |

देवराज इन्द्र देवताओं की माता दिति से कहते हैं: “यद्यपि भगवान की उपासना में ही निरत रहने वाले को भगवान से किसी भी प्रकार की भौतिक इच्छा, यहाँ तक कि मुक्ति की भी कामना नहीं रहती, तो भी भगवान कृष्ण उनकी समस्त कामनाओं को परिपूर्ण करते हैं” (श्रीमद् भागवतम 6.18.74) |

krsna with fruit womanश्रीमद् भागवतम (11.2.50) में नव योगेन्द्र महाराज निमि को भगवत-भक्तों के लक्षण बताते हुए कहते हैं: “जिसने एकमात्र भगवान वासुदेव की शरण ले रखी है, वह भौतिक काम वासनाओ पर आधारित सकाम कर्मों से मुक्त हो जाता है | वस्तुतः वह भौतिक इन्द्रियतृप्ति को भोगने की इच्छा से भी मुक्त हो जाता है | उसके मन में यौन जीवन, सामाजिक प्रतिष्ठा और धन का भोग करने की योजनायें उत्पन्न नहीं हो सकतीं | इस प्रकार वह सर्वोच्च पद को प्राप्त भगवान का शुद्ध भक्त माना जाता है” | तथा कहते हैं कि “शुद्ध कृष्ण-भक्त स्वेच्छा से सारा भौतिक भोग, यह जानते हुये त्याग देता है कि एकमात्र कृष्ण-प्रेम तथा उनके चरण-कमलों की सेवा ही, जीवन की असली सिद्धि है” (श्रीमद् भागवतम 11.2.53) | पदम् पुराण में शिवजी दुर्गा से कहते हैं कि “इस घोर कलियुग में जो व्यक्ति सभी धार्मिक कार्यों का परित्याग कर एकमात्र वासुदेव की सेवा में लगे हैं, केवल उनका जीवन कृतार्थ है इसमें कोई संशय नहीं |

नारद मुनि वसुदेव को भक्ति के नियम समझाते हुए कहते हैं: “जो मनुष्य अन्य समस्त कर्तव्यों को त्याग कर मुक्ति के दाता मुकुन्द के चरण-कमलों की शरण ग्रहण करता है और इस पथ पर गंभीरता पूर्वक चलता है, वह देवताओं, ऋषियों, जीवों, स्वजनों, मित्रों या पितरो के प्रति अपने कर्तव्य या ऋण से मुक्त हो जाता है” (श्रीमद् भागवतम 11.5.41) | श्री भगवान की सेवा करने से ऐसे दायित्व अपने आप पूरे हो जाते हैं|हमारा कोई भी कार्य केवल समय का अपव्यय है जब तक वह भगवान श्री कृष्ण के प्रति हमारी सेवा भावना जागृत नहीं करता |