fault finding
“आप अपने पत्र में किसी का दोष नहीं दिखा रहे । तो आप एक अच्छे वैष्णव हो । आप किसी में दोष नहीं देखते । यही पात्रता है । हमें स्वयं को सदैव बहुत ही विनम्र और निरहंकार समझना चाहिए । यह आपको पता होना चाहिए ।
इसलिए हम सभी को एक-दूसरे के साथ सहयोग करना होगा अन्यथा हम आपस में लड़ेंगे तो लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे ? एक भक्त अपने आचरण में सदैव आदर्शवान होता है ।
– श्रील प्रभुपाद
पतित उद्धारण को पत्र, मुंबई
१२ दिसंबर १९७४
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यदि भक्तों के बीच हम बन जाएँ एक मक्खी के समान,
गन्दगी जैसे ढूंढती है वो वैसे ही हम भी
करें उनकी निंदा और अपना बखान
ढूंढें उनकी कमियाँ और दिखाएँ उन्हें नीचा
यानि हमने भक्ति-लता बीज को ढंग से नहीं सींचा
किसी भी बात पर तिल का ताड़ बनायें
किसी से गलती हो भी जाये तो बातों का पहाड़ बनायें
भर दें उनके मन में भय और अपराध-बोध
इस से पहले कर लें अपने हृदय का शोध
क्या हम में नहीं हैं कोई कमी
हमारे हृदय में है कितनी कालिख जमी
यदि समय रहते हमने यह न पहचाना
तो समय के साथ पड़ेगा पछताना
ख़त्म हो जायेगा उत्साह और छूट जायेगा जप
जितनी भक्ति की है, शून्य हो जायेगा सब
इसलिए आज ही उन भक्तों से
मांगे क्षमा और करें दंडवत प्रणाम
वरना आपका कोई नहीं सहारा,
न हरि, न हरिनाम
कहलाना है आपको भक्त और यदि करनी है भक्ति
तो हृदय से इस नियम पालन के साथ हो सख्ती
कि न करेंगे किसी वैष्णव की निंदा
और न ही किसी को करेंगे शर्मिन्दा
एक भक्त का हृदय हो कोमल और निर्मल
शुद्ध प्रेम-भक्ति के प्रार्थी हैं आप, याद रहे हर पल
दास राधा रसिकराज जोड़े अपने हाथ
भक्ति में आगे बढ़ने को मांग रहा है आपका साथ ।