4 types of peopleन माम् दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता: ॥ भगवद् गीता ७.१५ ॥
कुछ लोग कृष्ण की शरण में नहीं जाते और जो कृष्ण की शरण में जाने के इच्क्षुक हैं उनका भी वे विरोध करते हैं । ऐसे नास्तिक लोग जब समाज के नायक बन जाते हैं तो सम्पूर्ण वातावरण अविद्या से भर जाता है । ऐसी दशा में लोग कृष्णभावनामृत आंदोलन का उत्साहपूर्वक स्वागत नहीं कर पाते जिस तरह से पीलिया रोग से पीड़ित रोगी मिश्री के स्वाद को नहीं जान पाता । किन्तु हमको यह पता होना चाहिए कि मिश्री ही पीलिया की विशेष औषधि है ।
इसी प्रकार वर्तमान भ्रमित मानव-समाज में कृष्णभावनामृत या भगवान के पवित्र नाम –
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे – ही इस संसार को ठीक करने की एकमात्र औषधि है । यद्यपि कृष्णभावनामृत रुग्ण व्यक्ति को अत्यंत रोचक नहीं लगता तो भी श्रील रूप गोस्वामी का यह परामर्श है कि यदि कोई भवरोग से अच्छा होना चाहता है तो उसे इस कृष्णभावनामृत को बड़ी ही सावधानी तथा मनोयोग से ग्रहण करना होगा ।
उसके रोग का उपचार हरे कृष्ण महामंत्र के जप तथा कीर्तन से प्रारम्भ होता है क्योंकि इस कीर्तन से भौतिकता में लिप्त मनुष्य सारी भ्रांत धारणाओं से मुक्त हो जाता है (चेतो-दर्पण-मार्जनं) । अविद्या, मनुष्य की आध्यात्मिक पहचान को भ्रमित करती है और यही ह्रदय में मिथ्या-अहंकार का आधार है । वास्तविक रोग हृदय में है । यदि मन स्वच्छ और भावना शुद्ध है तो भवरोग से मनुष्य को हानि नहीं हो सकती । मन तथा हृदय को समस्त भ्रांतियों से स्वच्छ करने के लिए हरे कृष्ण महामंत्र का जप तथा कीर्तन करना चाहिए । यह सरल और लाभकारी है ।
भगवान के पवित्र नाम के जप एवं कीर्तन से कोई भी भौतिक संसार की प्रज्ज्वलित अग्नि से तुरंत मुक्ति पा सकता है ।
भगवान के पवित्र नाम (जप) कीर्तन की तीन अवस्थाएं हैं – अपराध-युक्त अवस्था, अपराध कम करने की अवस्था और शुद्ध अवस्था । जब नवदीक्षित भक्त हरे कृष्ण (जप) कीर्तन प्रारम्भ करते हैं तो वे प्रायः अनेक प्रकार के अपराध करते हैं । इनमे से दस नाम-अपराध प्रमुख हैं, और यदि भक्त इनका त्याग करता है तो उसे अगली अवस्था का आभास होता है जो अपराध-युक्त (जप) कीर्तन और शुद्ध (जप) कीर्तन के बीच की अवस्था है । जब कोई शुद्ध अवस्था को प्राप्त करता है तो वह तुरंत मुक्त हो जाता है । इसे भव्-महादावाग्नि-निर्वापणम् कहते हैं । जैसे ही मनुष्य भौतिक-अस्तित्व के इस अग्नि से मुक्त होता है, वैसे ही वह दिव्य जीवन का रसास्वादन कर सकता है ।
सारांश यह है कि भवरोग से मुक्त होने के लिए मनुष्य को शुद्ध मन से हरे कृष्ण जप तथा कीर्तन करना चाहिए
प्रेषक: ISKCON Desire Tree – हिंदी