Srila-Prabhupada-chanting-in-parkSrila Prabhupada
रामकृष्ण मिशन के स्वामी निखिलानन्द ने श्रील प्रभुपाद को यह परामर्श दिया था कि अगर आप पाश्चात्य देश में रहना चाहते हैं तो आपको अपने पारम्परिक परिधान और विशुद्ध शाकाहारी सिद्धांत को त्यागना होगा । उन्होंने कहा था ऐसे वातावरण में माँसाहार और मदिरा एवं पतलून और कोट तो लगभग आवश्यक ही हैं । श्रील प्रभुपाद के भारत से प्रस्थान के पूर्व, उनके एक गुरु-भाई ने पाश्चात्य देशों में चाकू और कांटे से कैसे खाया जाता है, इसका भी प्रदर्शन करके दिखाया था ।
परन्तु श्रील प्रभुपाद ने कभी इस पाश्चात्य मार्ग को नहीं स्वीकारा । उनके परामर्शदाताओं ने उन्हें चेतावनी दी थी कि वे अजूबे बन कर न रहें अपितु अपने आप को अमेरिका की जीवनशैली में ढाल लें चाहे उसके लिए उन्हें भारत में धारण किये हुए अपने व्रतों को तोडना ही क्यों न पड़े; लगभग सभी भारतीय आप्रवासियों ने अपनी पुरानी जीवनशैली का त्याग कर दिया था । परन्तु श्रील प्रभुपाद के विचार अलग थे, उन्हें कोई डगमगा नहीं सकता था । उन्होंने विचार किया कि इन लोगों ने समझौता इसलिए किया क्योंकि वे पाश्चत्य देशों में तकनिकी ज्ञान की भीख मांगने आये थे और बोले कि “मैं यहाँ कुछ मांगने नहीं अपितु कुछ देने आया हूँ ।”

इस्कॉन के ५० वर्ष पर – श्रील प्रभुपाद ध्यान,
सत्स्वरूप दास गोस्वामी द्वारा

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