modern engineering education

भौतिक शिक्षा

ईशोपनिषद कहती है, “जो अविद्या की संस्कृति मेँ लगे हुए हैं, वे अज्ञान के गहनतम क्षेत्र मेँ प्रवेश करेंगे । शिक्षा दो प्रकार की होती है, भौतिक तथा आध्यात्मिक। भौतिक शिक्षा जड़-विद्या कहलाती है। जड़ का अर्थ है “जो चल-फिर न सके” अर्थात पदार्थ। आत्मा तो चल-फिर सकती है। हमारा शरीर पदार्थ तथा आत्मा का सम्मेल है। जब तक आत्मा वहाँ रहती है, शरीर हिलता-डुलता है। उदाहरणार्थ मनुष्य के कोट तथा पैंट तब तक हिलते-डुलते हैं, जब तक मनुष्य उन्हें पहने रहता है। एसा लगता है की कोट तथा पैंट ही हिल डुल रहे हैं, किंतु वास्तव मेँ यह तो शरीर है, जो हिलाता-डुलाता है। इसी तरह ये शरीर चलता फिरता है क्यूंकि आत्मा इसे चला फिर रही है। दूसरा उदाहरण मोटरकार का है। मोटरकार चलती है, क्यूंकि चालक उसे चला आ रहा है। जो मुर्ख होगा वह यहीँ सोचेगा की मोटर कार अपने आप चल रही है| अद्भुत यांत्रिक व्यवस्था के बावजूद भी मोटरकार स्वतः नहीँ चल सकती।

चूंकि लोगोँ को केवल जड़-विद्या अर्थ भौतिकतावादी शिक्षा दी जाती है, इसलिए वे सोचते हैं कि यह भौतिक प्रकृति अपने आप कार्य करती है, चलती फिरती है, और अनेक अद्भुत वस्तुएँ प्रदर्शित करती है। जब हम समुद्र तट पर होते हैं तो हम लहरोँ को चलते देखते हैं, लेकिन वे स्वतः नहीँ चलती।  हवा उन्हें चलाती है, और हवा को कोई और ही चलाता है। इस तरह यदि आप चरम कारण तक पहुंचे, तो आप को समस्त कारणोँ के कारण कृष्ण मिलेंगे। परम कारण की खोज करना ही असली शिक्षा है।

Sri Isopanisadइस प्रकार ईशोपनिषद कहती है कि जो लोग भौतिक शक्ति की बाह्य गतिविधियोँ द्वारा मोहित हो जाते हैं, वे अविद्या की पूजा करते हैं। आधुनिक सभ्यता मेँ प्रौद्योगिकी को समझने के लिए की किस तरह मोटरकार या हवाई जहाज चलता है बडे बडे संस्थान हैं। वे इसका अध्ययन कर रहे हैं कि इतनी सारी मशीनरी कैसे बनाई जाए किंतु ऐसा कोई शैक्षिक संस्थान नहीँ है, जो इस की खोज करे कि आत्मा किस तरह गतिशील है। वास्तविक गति देने वाले का अध्यन नहीँ किया जा रहा; उल्टे पदार्थ की बाह्य गति का अध्ययन किया जा रहा है।

मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मेँ भाषण देते हुए श्रील प्रभुपाद ने छात्रोँ से पूछा, “शरीर को चलाने वाले आत्मा का अध्ययन करने के लिए टेक्नोलॉजी कहाँ है?” उनके पास एसी कोई टेक्नोलॉजी नहीँ थी। वे ठीक से उत्तर न दे पाए, क्योंकि उनकी शिक्षा केवल जड़-विद्या थी। ईशोपनिषद् कहती है कि जो लोग एसी भौतिकतावादी शिक्षा की उन्नति मेँ लगे हुए हैं वे संसार के गहनतम भागोँ मेँ जाएंगे। वर्तमान सभ्यता बहुत ही खतरे मेँ है, क्यूंकि प्रामाणिक आध्यात्मिक शिक्षा के लिए संसार मेँ कहीँ कोई व्यवस्था नहीँ है। इस तरह मानव समाज को जगत के गहन अंधकार क्षेत्र मेँ धकेला जा रहा है।
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने एक गीत मेँ घोषित किया है कि भौतिकतावादी शिक्षा केवल माया का विस्तार है। इस भौतिकतावादी शिक्षा मेँ जितना आगे बढ़ेंगे, उतनी ही अधिक ईश्वर को समझने की हमारी क्षमता अवरुद्ध होगी और अंत मे घोषित करना पड़ जाएगा कि, “ईश्वर मृत है।” यह सब अज्ञान तथा अंधकार है।

अतः भौतिकतावादी लोग निश्चय ही अंधकार मेँ धकेले जा रहे हैँ। किंतु एक अन्य वर्ग भी है – तथाकथित दार्शनिकोँ, मनोधर्मियों, धर्मविदों तथा योगियों का – जो उससे भी अधिक गहन अंधकार मेँ जा रहे हैं, क्यूंकि वे कृष्ण की अनदेखी कर रहे हैं। वे अध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन करने का दिखावा करते हैं, किंतु उन्हें कृष्ण या ईश्वर का कोई ज्ञान नहीँ रहता। अतः उनकी शिक्षाएँ पक्के भौतिकतावादीयों की शिक्षाओं की अपेक्षा कहीँ और घातक हैं। क्यों? क्यूंकि वे लोगोँ को यह सोचने के लिए दिग्भ्रमित करते हैं कि वे असली ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। वे जिस तथाकथित योग प्रणाली की शिक्षा देते हैं-“केवल ध्यान करो और तुम समझ जाओगे कि तुम ईश्वर हो” – वह लोगोँ को दिगभ्रमित करती है। कृष्ण ने ईश्वर बनने के लिए कभी ध्यान नहीँ किया। वे जन्म से ही इश्वर थे। जब वे तीन माह के शिशु थे, तो पूतना नामक राक्षसी ने उन पर आक्रमण किया किंतु कृष्ण ने उसका स्तन-पान करके उसके प्राण निकाल लिए। अतः कृष्ण प्रारंभ से ही ईश्वर ही थे। यही ईश्वर है।

तथाकथित व्यर्थ के योगी शिक्षा देते हैं, “तुम स्थिर तथा मौन बन जाओ, और तुम ईश्वर हो जाओगे। हम मौन कैसे हो सकता हैं? क्या मौन बनने की कोई संभावना है? नहीँ एसी कोई संभावना नहीँ है। “इच्छारहित हो जाओ और तुम ईश्वर बन जाओगे।” भला हम इच्छारहित कैसे हो सकते हैं ? ये सब बहकावे हैं। हम इच्छारहित हो नहीँ सकते, हम मौन नहीँ हो सकते। लेकिन हमारी इच्छाएं तथा हमारे कार्यकलाप शुद्ध बनाए जा सकते हैं। यही असली ज्ञान है। हमारी एकमात्र इच्छा कृष्ण की सेवा करने की होनी चाहिए।  इच्छा की शुद्धि है। स्थिर तथा मौन होने के बजाए हमेँ अपने कार्योँ को कृष्ण की सेवा से जोड़ देना चाहिए।  जीवित व्यक्ति के रुप मेँ हम मेँ गतिविधियाँ, इच्छाएँ प्रेमप्रवृत्ति होती हैं, किंतु इन्हे गलत दिशा दी जा रही है। यदि हम उन्हें कृष्ण की सेवा मेँ लगाते हैं तो वह शिक्षा की पूर्णता है।

हम यह नहीँ कहते की आप भौतिक शिक्षा मेँ आगे न बढ़ेँ। आप आगे बढ़ेँ, किंतु साथ ही कृष्णभावनाभावित बनें। यही हमारा संदेश है। हम यह नहीँ कहते की आपको मोटरकारें नहीँ बनानी चाहिए। नहीँ, हम कहते हैं, “ठीक आपने ये मोटर कारें तैयार कर लीं। अब इन्हें कृष्ण की सेवा मेँ लगाइए।” यही हमारा प्रस्ताव है।

अतः शिक्षा आवश्यक है, किंतु यदि यह निरी भौतिकतावादी है – यदि यह कृष्णभावना से विहीन है – तो यह अत्यंत घातक है। यही ईशोपनिषद का कथन है।