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आज श्रील नरोत्तम दास ठाकुर का तिरोभाव दिवस है । गौड़ीय-वैष्णव सम्प्रदाय में उनका एक उच्च स्थान है । वे वृन्दावन के षड-गोस्वामियों के निकटतम पार्षदों में से एक हैं । श्रील जीव गोस्वामी ने उन्हें “ठाकुर महाशय” की उपाधि से अलंकृत किया था । वे कृष्णलीला में “चम्पक मंजरी” हैं ।  उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु और रूप-सनातन गोस्वामी द्वारा प्रतिपादित गौड़ीय-वैष्णव परंपरा के अंतर्गत आने वाले वैष्णव भक्तों के मनोभाव को सटीक तरीके से अपने लेखनी के द्वारा वैष्णव गीतमाला के रूप में प्रस्तुत किया है । उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में “प्रार्थना” और “श्री प्रेमभक्ति चन्द्रिका” नामक गौड़ीय वैष्णव भजन और दर्शन सबसे अधिक प्रसिद्द हैं ।

— श्री वृन्दावन में श्रील नरोत्तम दास ठाकुर का आगमन —

मथुरा में श्री श्री रूप सनातन के अंतर्ध्यान की बात सुनकर श्री नरोत्तम “हा रूप, हा सनातन” कहकर धूल में लोटपोट होकर रुदन करने लगे। श्री रूप-सनातन ने स्वप्न में दर्शन देकर उन्हें सांत्वना प्रदान की। सुबह होते ही वे वृन्दावन चल पड़े। श्री निवास आचार्य तब वृन्दावन में रहते थे। श्री रूप गोस्वामीपाद ने स्वप्न में श्री जीव और श्री निवास को श्री नरोत्तम के आगमन की बात बताई। वृन्दावन में श्री गोविंददेव जी के मंदिर में श्री नरोत्तम की भेट श्री जीव गोस्वामी और श्री निवास आचार्य से हुई। श्री जीव गोस्वामी श्रील नरोत्तम को लेकर गौर-पार्षद श्री लोकनाथ गोस्वामी की कुटीर पर गए, श्री नरोत्तम का परिचय कराया और उन पर कृपा करने के लिए अनुरोध किया। इससे पूर्व श्रीमन महाप्रभु श्रील लोकनाथ गोस्वामी के स्वप्न में आकर नरोत्तम को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने का आदेश दे चुके थे।
तत्पश्चात श्रील लोकनाथ गोस्वामीपाद ने श्री नरोत्तम को हरिनाम दीक्षा दी।

—श्रील प्रभुपाद प्रवचन के अंश–

हमारी वर्तमान स्थिति यह है कि हम भवरोग से पीड़ित हैं और हमें इस भव-रोग से मुक्त होना है । भवरोग यानि इन्द्रियतृप्ति और सबसे दुर्जेय रोग है कामवासना । यह भव-रोग है । इसलिए “विषय छाड़िया…”, हमें विषयों के दूषण, भौतिक इन्द्रियतृप्ति से मुक्त होना है । 
यही श्रील नरोत्तम दास ठाकुर का कहना है, 
विषय छाड़िया कबे शुद्ध हबे मन । 
कब हम हेरबो श्री वृन्दावन ॥
कब मेरा मन भौतिक इच्छाओं से मुक्त होगा और मैं वृन्दावन के दर्शन कर पाउँगा । भौतिक इच्छाओं के साथ वृन्दावन का दर्शन कर पाना अत्यंत कठिन है । भक्ति का अर्थ है, सर्वप्रथम भौतिक इच्छाओं से मुक्त होना।

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