SrilaPrabhupada JaladutaSumati_morarjee

Srila Prabhupada with Sumati Morarji SP with Sumati Morarji

कैसे देश की एक अग्रणी जलयान कंपनी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के संदेश को संसार भर में प्रचार करने में सहायता की 
१९६५ में “सिंद्धिया स्टीम नेविगेशन कंपनी” देश की सबसे पुरानी, बड़ी और जानी-मानी जलपोत कंपनियों में इस एक हुआ करती थी। मालवाहक पोत होने के कारण अधिकतर उनके जहाजों में दवाइयाँ, कपड़े, खाद्य पदार्थ इत्यादि बड़े बड़े बक्सों में भर कर कई देशो में भेजा जाता था। उसी वर्ष के अगस्त महीने में एक मालवाहक-पोत एक ऐसे सवारी को बैठा कर ले गया जो आने वाले दिनों में संसार भर में एक इतिहास रचने वाला था।
इस्कॉन के भक्तों को अच्छे से ज्ञात है कि कैसे उस मालवाहक जहाज के एकमात्र सवारी कूपे में ६९ वर्षीय, विश्व के लिए अज्ञात एक वैष्णव सन्यासी, कृपापूर्वक-अर्जित टिकट लेकर चढ़ा। इसके आगे क्या हुआ वो  श्रील प्रभुपाद के अनुयायिओं को अच्छे से ज्ञात है। परन्तु कुछ अंश ऐसे भी हैं जिसपर आजतक किसी ने भी नहीं सोचा । इस लेख में हम ये जानेंगे।
सुमति मोरारजी : वह स्त्री जिसने पाश्चात्य देशो में कृष्ण भक्ति के प्रचार को फ़ैलाने में एक बड़ी ही अहम भूमिका निभाई ।
१३ मार्च, १९०९ को पिता मथुरादास गोकुलदास और माता प्रेमाबाई से जन्मी सुमति को बचपन में कृष्ण की प्रिय, पवित्र नदी, जमुना के नाम से बुलाया जाता था । यह नियति ही है कि भविष्य में उन्हें पानी से ही जुड़े रहना था। किसको यह पता था कि वह एक विशाल जलपोत कंपनी का प्रबंधन करने में विश्व की पहली महिला होगी। वह छह उच्च शिक्षित भाइयों में अकेली थी परन्तु इस व्यापार को प्रतिष्ठित सफलता दिला पाने का सेहरा उनके सर ही बंधा।
भारतीय परम्पराओं के अनुसार बचपन में ही उनका विवाह एक समृद्ध कपड़ो के व्यापारी, नरोत्तम मोरारजी के एकमात्र पुत्र शांति कुमार से हो गया था। उनका व्यापार मुंबई एवं शोलापुर में चलता था।
दोनों धनवान परिवार अपने अपने क्षेत्रों में जाने-माने थे और मुंबई में उनका विवाहोत्सव, जोकि एक सप्ताह तक चला, बहुत ही धूमधाम से मनाया गया जिसकी खबरें अखबारों में महीनो तक चली ।
अपनी बहु की प्रतिभाओं को जानकार श्री नरोत्तम जी ने उनका नाम “सुमति” रख दिया । वे हिंदी, मराठी एवं अंग्रज़ी भाषाओँ में निपुण थी और धीरे-धीरे अपने ससुर के व्यापार को समझकर उसमे रूचि दिखाने लगी। जब नरोत्तम जी की पत्नी का देहांत हो गया तो सुमति को घर का सारा कार्यभार सम्भालना पड़ा। इस तरह वे घर एवं व्यापार दोनों को कुशलता पूर्वक सँभालने लगीं ।
वल्लभ सम्प्रदाय में जन्मी, सुमति बड़ी ही धार्मिक थी एवं श्रीनाथ जी की भक्त थी। वे, भगवान के परम भक्तों में से एक, तुलसी महारानी की सेवा बड़ी तन्मयता से करती थी । उन्होंने आध्यात्मिक भावनाओं के साथ अपने घर और व्यापार को चलाया ।
नरोत्तम ने अपने परदादा से प्राप्त जलपोतों के कारोबार को जल्द ही सुमति के सुपुर्द कर दिया । नरोत्तम ने कुछ जलपोतों को मिलाकर “सिंधिया स्टीम नेविगेशन कंपनी” की शुरुआत की जो प्रथम भारतीय शिपिंग कंपनी बनी। सुमति ने इस कारोबार को बहुत आगे बढ़ाया जिसके लिए महात्मा गांधी ने उनकी प्रशंसा की । वे गांधी जी से निरंतर पत्र-व्यवहार रखती थी ।
१९१९ में स्थापित यह कंपनी पहली और सबसे अधिक विख्यात जलपोत कंपनी बनी। १९८० में बंद होने से पहले वे ब्रिटेन, अमेरिका, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और खाड़ी देशो में अपने मालवाहक जहाज भेजते थे । १९४६ में सुमति मोरारजी ने इस कंपनी की कमान संभाली और अपनी कार्यक्षमता के कारण कई पुरस्कारों से नवाज़ी गयी । १९६५ में श्रील प्रभुपाद से मिलने के पहले वे कंपनी के सारे निर्णय लेने लग गयी थी ।
श्रील प्रभुपाद से भेंट 
सुमति मोरारजी ने श्रील प्रभुपाद को पहली बार १९५० में कुरुक्षेत्र में देखा था । उस समय वे सन्यासी नहीं थे। वे एक पेड़ के नीचे बैठकर जप कर रहे थे। उनकी तन्मयता और विनम्रता को देखककर सुमति ने उनके निकट जाकर आशीर्वाद की इच्छा जताई थी। जब वे श्रील प्रभुपाद से मुंबई में मिली तो यह सब बातें कहीं। श्रील प्रभुपाद अब एक सन्यासी बन चुके थे और अमेरिका जाने के लिए सहायता मांग रहे थे ।
श्रील प्रभुपाद, मथुरा के एक व्यापारी श्री अग्रवाल से मिले थे और अपने गुरु कि पाश्चात्य देशों में कृष्ण-भक्ति प्रचार की आज्ञा पालन करने की इच्छा जताई थी। श्री अग्रवाल ने श्रील प्रभुपाद को अपने इंजीनियर पुत्र के पेंसील्वेनिया में होने के बारे में बताया और आने, जाने एवं प्रारंभिक दिनों में वहां रहने का सारा खर्च उठाने के लिए सहमत हो गए । तुरंत ही विदेश मंत्रालय से उन्हें जाने का अनुमति-पत्र भी मिल गया ।
श्रील प्रभुपाद वहां से मुंबई आये और सुमति मोरारजी से सहायता लेने का मन बनाया । उन्हें विश्वास था कि वे अवश्य ही मदद करेंगी क्योकि वे पहले ही कुरुक्षेत्र में मिल चुकी थी एवं उन्होंने श्रीमद् भागवतम् के द्वितीय स्कंध की छपाई के लिये पर्याप्त धनराशि देकर मदद की थी । परन्तु सुमति मोरारजी ने लम्बे समुद्री सफर में स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका और श्रील प्रभुपाद की अधेड़ उम्र के कारण सहायता करने से मन कर दिया । ऊपर से यह चिंता भी उन्हें थी की श्रील प्रभुपाद इस से पहले कभी भी विदेश नहीं गए थे।
श्रील प्रभुपाद में सुमति मोरारजी के सचिव श्रीमान चोकसी से बात की और उन्हें यह खबर पहुचने के लिए मना  लिया कि , “यह व्यक्ति बहुत दृढ़ निश्चय लेकर आया है और पाश्चत्य देशों में कृष्ण भक्ति का प्रचार करने का इक्षुक है।” उनके स्वास्थ्य की चिंता करते हुए श्रीमती मोरारजी ने फिर मना कर दिया ।
ऐसे ही समय बीतता गया और आखिरकार श्रीमती मोरारजी ने श्रील प्रभुपाद से व्यक्तिगत साक्षात्कार करने के लिए हाँ कर दी।
कमरे में दाखिल होते ही श्रील प्रभुपाद ने कहा “मुझे एक टिकट चाहिए”।
उनकी आँखों में अपने गुरु के आज्ञा पालन और भगवान कृष्ण की इच्छा पूरी करने की दृढ़ता झलक रही थी । इस बार उनको मना कर पाने में अक्षम होकर श्रीमती मोरारजी ने १३ अगस्त, १९६५ को कलकत्ता से प्रस्थान करने वाले “जलदूत” नामक जलपोत में जाने का टिकट की व्यवस्था कर दी। उन्होंने इस बात का ध्यान रखा की जहाज़ का कप्तान वैष्णव भोजन की आवश्यकताओं को समझता हो। कप्तान अरुण पंड्या ने स्वामीजी के लिए अतिरिक्त फल एवं सब्जियों की व्यवस्था कर ली थी ।
प्रस्थान करने के दो दिन पूर्व श्रील प्रभुपाद कलकत्ता आये। वहां से वे अपने गुरु श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की समाधी पर आशीर्वाद हेतु मायापुर पहुंचे।
श्रील प्रभुपाद अपने साथ श्रीमद् भागवतम् प्रथम स्कंध के २०० त्रि-खण्डीय सेट, एक अटैची, एक छाता और कुछ अन्न लेकर चले थे। सत्तर वर्ष की आयु में श्रील प्रभुपाद, ह्रदय में गुरु की आज्ञाकारिता का दृढ़ विश्वास लेकर एक चुनौतीपूर्ण यात्रा पर निकले, जो उनसे आधी आयु के युवकों के लिए भी कठिन था।
वह समुद्री यात्रा 
दस दिनों की यात्रा के बाद जब जहाज लाल सागर पहुंचा तब प्रभुपाद को कठिनाइयां होने लगी। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा : “वर्षा, समुद्री व्याधियां, चक्कर आना, सिर दर्द, अपच, उल्टी आदि से त्रस्त हूँ परन्तु यह लक्षण उस से अधिक कुछ कह रहे हैं।” छाती में असहनीय पीड़ा ने उनको यह सोचने पर मजबूर कर दिया था की वे अब जी नहीं पाएंगे। दो दिनों में उन्हें दो हृदयाघातों का सामना करना पड़ा । लेकिन उन्होंने अपने मिशन के उद्देश्य पर ध्यान लगाकर कठिनाईयों को सहन किया।
एक रात श्रील प्रभुपाद को स्वप्न में कृष्ण विभिन्न अवतारों द्वारा नौका चलाते हुए दिखाई दिए और कृष्ण कह रहे हैं, “डरो मत आगे बढ़ो”। इसके बाद श्रील प्रभुपाद को ढाढस बंधा और आगे कुछ भी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा।
१० सितम्बर तक श्रील प्रभुपाद इस समुद्री यात्रा के आदि हो गए। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा, “जहाज अब शांतिपूर्वक चल रहा है। मुझे भी अपेक्षाकृत अब अच्छा लग रहा है। परन्तु मुझे वृन्दावन, गोविंदजी, गोपीनाथजी एवं राधा-दामोदर जी की याद आ रही है। अभी मेरा एकमात्र सहारा श्री चैतन्य-चरितामृत में श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएं हैं। मैंने सिर्फ श्री चैतन्य एवं अपने गुरु के आदेश का पालन करने के लिए भारत-भूमि को छोड़ दिया है। मेरी कोई भी योग्यता नहीं है, परन्तु मात्र उनके आदेशो के पालन के लिए मैंने ये जोखिम उठाया है। मैं वृन्दावन से दूर केवल उनकी कृपा पर निर्भर हूँ।”
जहाज के कप्तान कहते हैं की वो समुद्री यात्रा उनकी सबसे शांतिपूर्ण यात्रा थी। श्रील प्रभुपाद ने उसे कृष्ण की कृपा कहा। वे अपनी डायरी में लिखते हैं,”अगर अटलांटिक में अपना वास्तविक स्वरुप दिखाया होता तो मैं शायद जीवित न होता। परन्तु श्री कृष्ण ने सारा प्रभार संभाल लिया है।”
पैंतीस दिनों की यात्रा के बाद १७ सितम्बर, १९६५ को प्रातः ५:५० पर जहाज बॉस्टन के बंदरगाह पर पहुंचा। कुछ समय वहां रुकने के बाद जहाज न्यूयॉर्क के लिए रवाना हुआ। पेंसीलवानिया में दो महीने बिता कर श्रील प्रभुपाद न्यूयॉर्क के “लोअर ईस्ट साइड” नामक स्थान पर आ गए जहाँ से इस विश्वव्यापी आंदोलन की शुरुआत हुयी।
सबसे मूल्यवान निर्यात 
आने वाले वर्षों में श्रील प्रभुपाद पत्रों द्वारा सुमति मोरारजी के संपर्क में रहे। वे कई बार प्रभुपाद को कुछ परामर्श दिया करती थी। श्रील प्रभुपाद अपने और आंदोलन के विकास का समाचार उन्हें दिया करते थे। कई बार उन्होंने पत्रों में सुमति मोरारजी का आभार प्रकट किया कि उनके कारण आज चैतन्य महाप्रभु का आंदोलन विश्व भर में फाइल रहा है।
ये पत्राचार श्रील प्रभुपाद के देह-त्याग,१९७७ तक चला।
उसके २१ वर्ष बाद, सुमति मोरारजी का देहांत हृदयाघात के कारण ९१ वर्ष की आयु में, २८ जून १९९८ को हुआ।
सुमति मोरारजी का निर्यात का व्यापार सफल हुआ क्योकि उनकी श्रील प्रभुपाद की सहायता से भारत की सबसे अमूल्य धरोहर को विश्व भर में निर्यात करने में सहायता मिली।