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यहाँ तक कि सौ वर्ष पहले तक, गिरीश चंद्र घोष यूरोप के नाटकीय प्रदर्शनों की भाँती, नाटकों में पुरुष एवं स्त्री के एक साथ भाग लेने को प्रचलित करना चाहते थे । इसके लिए उन्होंने महिला-अभिनेत्रियों को निमंत्रित करना चाहा । परन्तु एक भी महिला सम्मिलित नहीं हुयी । कौन सम्मानीय युवती नृत्य करने के लिए जनता के समक्ष जाना चाहेगी ? वे कभी नहीं जाएँगी । ये तो मैं सौ वर्ष पूर्व की बात बता रहा हूँ ।

अभी चालीस वर्ष पहले की बात है, हमारे गाँव के किसी व्यक्ति की बेटी का विवाह होना था, और यह भारतीय रीति है कि वर-पक्ष लड़की देखने आते हैं । उसी प्रकार वधु-पक्ष भी देखने जाते हैं कि सब ठीक है कि नहीं ।
तो वे हमारे एक मित्र की बेटी को देखने आये । वह अत्यंत धनाढ्य व्यक्ति की सुन्दर लड़की थी । तो वर-पक्ष में से किसी ने प्रश्न किया, “क्या तुम्हें नृत्य करना आता है ?” यह उस लड़की से उनका प्रश्न था कि, “क्या तुमने कुछ नृत्य या गायन की शिक्षा ली है ?” वह मेरे मित्र मुकुंद मल्लिक की पुत्री थी । उनके बड़े-भाई वहीं पर थे । वे क्रोधित हो गए कि, “यह धूर्त पूछ रहा है कि हमारी पुत्री को गायन तथा नृत्य आता है या नहीं ।” उन्हें यह अपमानजनक लगा कि, “एक सम्मानित परिवार की बेटी नृत्य करना सीखेगी, गाना सीखेगी । इसलिए उन्होंने तुरंत इसका विरोध किया । “नहीं नहीं इसे नाचना-गाना नहीं आता है । यह उसका लक्ष्य नहीं है । हम सभी को युवतियों का नृत्य और गायन अच्छा लगता है परन्तु इसके लिए हम अपने परिवार में किसी को यह नहीं सिखा सकते । इसके लिए हम बाहर जाते हैं । हम मल्लिक परिवार की बेटी के नृत्य करने तथा गाना गाने की कल्पना भी नहीं कर सकते । नहीं, यह सही नहीं है ।

नृत्य करना ? गीत गाना ? यह क्या बकवास है ? एक सम्मानित परिवार के लिए ? यह सब निम्न-स्तर के व्यावसायिक लोगों के लिए है । उन्हें धन दो, वे नृत्य करेंगे । या किसी वैश्या के पास चले जाइये, वह नृत्य करेगी । तो उनके कहने का तात्पर्य यह था कि, “हमें भी नृत्य में कुछ रूचि है परन्तु ऐसा नहीं है कि हमारे परिवारजन ही वह करेंगे । हम बाहर जाकर उसके लिए धन खर्च करते हैं ।”

इसलिए यह कला…और उसमे भी इस नाटक के लिए, गिरीश चंद्र घोष को किसी भी सम्मानित परिवार से एक भी प्रतिक्रिया नहीं मिली । तब उन्हें वैश्याओं के समूह से कुछ युवतियों को चुनना पड़ा । अंततः वे प्रसिद्ध कलाकार हो गयीं, कुसुमकली दासी और एक अन्य कोई दासी ।

आजकल तो यह फैशन हो गया है कि कुलीन परिवार भी सिनेमा से जुड़ रहे हैं और अपना आचरण बर्बाद कर रहे हैं । अन्यथा यह किसी सम्मानित व्यक्ति के लिए नहीं है ।

 

– श्रील प्रभुपाद, २७ जुलाई १९७६, लन्दन