Brahmana and Vaishnava

 

यद्यपि श्री रसिकानंद, एक ब्राह्मण कुल में जन्मे थे, परंतु उन्होंने श्री श्यामानंद प्रभु से दीक्षा ली थी जोकि ब्राह्मण-कुल में नहीं जन्मे थे । ऐसे कई दृष्टांत हैं जिसमे ब्राह्मण-कुल में जन्मे लोगों ने ऐसे व्यक्तियों से दीक्षा ली जो ब्राह्मण कुल में नहीं जन्मे थे ।

एक ब्राह्मण के लक्षण श्रीमद भागवतम (७.११.३५) में वर्णित हैं :

यस्य-यल्लक्षणं प्रोक्तम पुंसो वर्णा अभिव्यंजकम ।

यद् अन्यत्रापि दृशयेत तत तेनैव विनिर्दिषेत ॥

यदि कोई व्यक्ति एक शूद्र परिवार में जन्म लेता है परंतु उसमे एक आध्यात्मिक गुरु के सभी लक्षण हैं तो उसे मात्र एक ब्राह्मण ही नहीं परंतु योग्य आध्यात्मिक गुरु के रूप में भी स्वीकार करना चाहिए । यह श्री चैतन्य महाप्रभु का भी निर्देश है । इसलिए श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने सभी वैष्णवों के लिए नियमानुसार जनेऊ संस्कार आरम्भ करवाया था ।

एक वैष्णव ब्राह्मण का चयन उसके जन्म के आधार पर नहीं अपितु उसके गुणों पर आधारित होता है । दुर्भाग्यवश, कुछ मूढ़ लोग एक ब्राह्मण और एक वैष्णव के मध्य अंतर नहीं समझ पाते । उनकी यह धारणा होती है कि यदि कोई ब्राह्मण नहीं है तो वह गुरु नहीं बन सकता । इसी कारण श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस श्लोक में यह कहा है :

किब विप्र, किब न्यासी, शूद्र केने नय ।

येई कृष्ण-तत्त्व-वेत्ता, सेई गुरु हय ॥

(चै च मध्य ८.१२८)

 

पद्म-पुराण में वर्णित है :

न-शूद्र भगवद-भक्तास ते पि भागवतोत्तमाः ।

सर्व-वर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने ॥

जो वास्तव में भगवान कृष्ण के आध्यात्मिक ज्ञान में अग्रणी है वह कभी शूद्र नहीं हो सकता, चाहे वह एक शूद्र परिवार में ही क्यों न जन्मा हो । परंतु एक विप्र या ब्राह्मण जो छः ब्रह्म-क्रियाओं (पठन, पाठन, यज्ञ, याजन, दान, प्रतिग्रह) और वैदिक स्तुतियों के उच्चारण में निपुण होने पर भी एक आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता, यही वह एक वैष्णव नहीं है । परंतु यदि कोई एक चांडाल-परिवार में भी जन्मा हो और कृष्णभावनामृत में निपुण है, तो वह गुरु बन सकता है ।