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भगवान् का विश्वरूप

उत्तर : परम पूर्णता का अर्थ ही है कि वे निराकार और साकार दोनों हैं । इसकी पुष्टि भगवान् स्वयं भगवद-गीता के श्लोक संख्या ७.२४ में करते हैं और श्रील प्रभुपाद भी अपने तात्पर्य में बताते हैं, “श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि निर्विशेष या निराकार ब्रह्म से ही परम अनुभूति प्रारंभ होती है जो आगे बढ़कर अन्तर्यामी परमात्मा तक जाती है, किन्तु परमसत्य की अन्तिम अवस्था भगवान् ही हैं |”
तो जो आपका प्रश्न है कि ‘परम पूर्ण’ निराकार क्यों नहीं हो सकता ? वे निराकार भी हैं और साकार भी, इसलिए अर्जुन १२.१ में पूछते हैं कि किसकी भक्ति सही है साकार की या निराकार की ?
भगवान् १२.२ में बताते हैं कि जो साकार रूप में उनकी भक्ति करते है वही सम्पूर्ण रूप से उन्हें जान पाते हैं।
आशा है आपके प्रश्न का उत्तर आपको मिल गया होगा ।
आपका बहुत बहुत धन्यवाद।