शिव यानि मंगल या कल्याणकारी, वे शंकर, शम्भू, महादेव, महेश रूद्र आदि नामों से भी पुकारे जाने वाले आदिदेव इस भौतिक जगत के नियंता भी हैं। ब्रह्म-संहिता के अनुसार

क्षीरं यथा दधि विकार-विशेष योगात् 
संजायते न हि ततः पृथगस्ति हेतोः |
यः शंभुतामपि तथा समुपैति कार्याद् 
गोविंदं आदिपुरुषं तमहं भजामि ||

ब्रह्मा जी बताते हैं कि जिस प्रकार दही, दूध से ही उत्पन्न होता है परन्तु दूध का विकृत स्वरूप है उसी प्रकार शिव जी भी इस भौतिक जगत के नियंता के रूप में ब्रह्मा एवं विष्णु के साथ सृष्टि के संचालन में सहायता करते हैं। अन्यत्र वर्णन आता है कि ब्रह्मा विष्णु महेश रजो, सत्व तथा तमो गुण द्वारा इस भौतिक जगत की व्यवस्था चलाते हैं। विष्णु तथा महेश गुणातीत हैं, गुणों से परे हैं और उनकी अधिष्ठता में इस जगत की सृष्टि एवं विनाश होता है। इसी सन्दर्भ में उन्हें गुणावतार भी कहा गया है।

कई बार यह गलत धारणा फैलाई जाती है कि शिव जी तमोगुण से प्रभावित होते हैं परन्तु ऐसा बिल्कुल नहीं है। भगवान शिव गुणों से परे हैं और इस जगत में तमोगुण के अधिष्ठाता देव वही हैं। तमोगुण के अधीन भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर आदि उनके अनुयायी हैं।
महाभारत के अनुशासन-पर्व में विष्णु के सहस्त्र नाम में शिव, रूद्र, स्थानु एवं रूद्र नाम से एक अर्थ यह भी निकलता है कि दोनों में कोई भेद नहीं है।

तो इस प्रकार कई शास्त्रों में हम यह पाते है की विष्णु एवं शिव में कोई भेद नहीं है परन्तु अधिक गहन अध्ययन में हम पाएंगे कि भेद है भी। इस को श्री चैतन्य महाप्रभु ने अचिन्त्य-भेदाभेद तत्त्व की संज्ञा दी थी। अब भेद कैसे है ?
श्रीमद भागवतम के १२वें स्कन्द में वर्णित है कि यह श्रीमद भागवत सभी वेदों का सार है और उसी वेदों के सार भागवत में यह वर्णित है कि वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ शम्भू हैं। वैष्णवानाम यथा शम्भू 
श्रीमद भागवतम के ही चौथे स्कन्द में भगवान शिव रूद्र गीत का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जो भी इस स्तोत्र का पाठ करता है उसके लिए भगवान कृष्ण की भक्ति पाना सहज हो जाता है।

वैष्णव परंपरा में से एक, रूद्र-संप्रदाय के भक्त भगवान शिव द्वारा प्रदत्त कृष्ण भक्ति के मार्ग का अनुशीलन करते हैं तथा इस परंपरा के आचार्य श्री विष्णुस्वामी जी हैं।

पद्म पुराण में भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती को उपदेश करते हुए बताते हैं
श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥  
अर्थात हे रमा !  हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान हैं। मैं सदा रामका स्तवन करता हूं और राम-नाम में ही रमण करता हूं ।
इस प्रकार शास्त्रों के गहन अध्ययन से हम पाते हैं कि भगवान शिव और विष्णु के बीच कोई भेद नहीं है और शिव जी भगवान विष्णु को आराध्य मानते हैं।

श्रीमद भागवतम के ही आठवें स्कन्द में भगवान शिव द्वारा भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार के दर्शन हेतु याचना करने पर विष्णु जी ने उन्हें मोहिनी रूप के दर्शन दिए और परन्तु हुआ क्या ?विष्णु जी ने अपनी माया द्वारा मोहिनी के प्रति शिव जी का आकर्षण उत्पन्न करके उन्हें भ्रमित कर दिया । ये लीला दो श्रेष्ठ व्यक्तित्वों के बीच का आदान प्रदान है पर कुछ अपरिपक्व लोगों को ऐसा लगता है की ये शिव जी और विष्णु जी के बीच श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा है। ऐसी सोच बहुत ही निम्न कोटि की मानी जानी चाहिए।

भगवान कृष्ण की रासलीला में भाग लेने  लिए आतुर भगवान शिव जी ने गोपी का रूप लिया और आज भी हम देख सकते हैं कि श्री धाम वृन्दावन में उन्हें गोपेश्वर महादेव के रूप पूजा जाता है जहाँ उनका श्रृंगार एक गोपी के रूप में होता है।
भगवान शिव हर धाम के क्षेत्र पालक के रूप में धाम की रक्षा करते हैं।
मथुरा में वे भूतेश्वर महादेव के रूप में हैं ,
मानसी गंगा, गोवर्धन में वे चकलेश्वर महादेव के रूप में हैं
नंदगांव में वे नंदेश्वर महादेव रूप में हैं
काम्यवन में कामेश्वर महादेव के रूप में और
श्रीधाम वृन्दावन के दिक्पाल हैं गोपेश्वर महादेव जी

गौड़ीय वैष्णवों के लिए श्री धाम वृन्दावन एक प्रमुख स्थान है और कई गौड़ीय वैष्णव ग्रंथों में हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा वृन्दावन स्थित गोपेश्वर महादेव की स्तुतियों द्वारा गुणगान हुआ है।
श्रील नरहरि चक्रवर्ती भक्ति-रत्नाकर ग्रन्थ में लिखते हैं कि मैं गोपेश्वर महादेव को प्रणाम करता हूँ जो भक्ति में आने वाले सभी क्लेशों को हरते हैं तथा वृन्दावन में भगवत-प्रेम सुलभ कराते हैं।
जब भगवान शिव को यह ज्ञात हुआ की भगवान कृष्ण ने गोकुल में बालक के रूप में जन्म लिया है तो उन्होंने पार्वती से उनसे मिलने की इच्छा जताते हुए नंदगांव जाने की अनुमति मांगी।
और वे पहुँच गए अपने औघड़ वेश में उनसे मिलने।  यशोदा ने जब देखा कि कोई अघोरी बाबा कान्हा से मिलने आये हैं तो उनके रूप से कहीं कान्हा डर न जाए, ऐसा सोचकर उन्होंने मिलने से मना कर दिया। बाबा ने बिना मिले न जाने की ज़िद की और कुछ दूर जाकर बैठ गए। भगवान को भी शिव जी को दर्शन देने की आतुरता थी तो वे भी रोने लगे और ऐसे रोये की किसी के चुप कराने से चुप न होएं। तब किसी ने सलाह दी कि शायद उन बाबा को कान्हा से न मिलवाने के कारण यह अपशकुन हुआ है और कान्हा रो रहे है। तब भगवान शिव को बुलवाया गया और भगवान शिव के कान्हा को स्पर्श करते ही वे शांत हो गए। तब मैया यशोदा ने शिव जी से आग्रह किया कि आपके यहाँ आने से हमारा कान्हा रोता नहीं है इसलिए आप यहीं रहिये। तब से भगवान शिव नंदेश्वर महादेव के रूप में नंदमहल में रहते हैं।

यह अद्भुत लीला हमें दर्शाती है कि भगवान के भक्त की उनसे मिलने की आतुरता ही उनके दर्शन करवा सकती है।
कहा जाता है कि भगवान शिव की अनुमति के बिना किसी को भी धाम में प्रवेश करने की अनुमति नहीं मिलती। इसलिए आइये हम भी भगवान शिव, आशुतोष, भोलेभंडारी से प्रार्थना करें कि कृपया हमारे ह्रदय में बसी भौतिक संसार के भोग करने की इच्छा को निकाल बाहर करें और भगवान कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पित भाव से भक्ति करने में आने वाली सभी बाधाओं को हटाएँ ताकि हम इस जीवन-मृत्यु के चक्र से बाहर निकल सकें और जीवन के अंत में भगवद्धाम प्राप्त करें।

– राधा रसिकराज दास 

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