— भारत के माननीय राष्ट्रपति, श्री प्रणब मुख़र्जी का पत्र —

Pranab Mukherjee

मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुयी कि अंतराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कॉन) इस जन्माष्टमी, २५ अगस्त २०१६, को अपनी ५०वीं वर्षगांठ मना रहा है।

विश्व में इस्कॉन आंदोलन के समानांतर विरले ही हैं जो अपने गतिवान विस्तार, अंतराष्ट्रीय, अंतरजातीय, अंतरव्यवसायिक आकर्षण, सार्वजनिक सादगी और अनुयायियों की भक्तिमय ऊर्जा की बराबरी कर सकते हैं। यह इस्कॉन के अनुयायियों के दृढ उत्साह को सम्मान है कि वें संपूर्ण विश्व में पिछले कई दशकों से अनवरत विद्यमान हैं।

मुझे ज्ञात है कि आज यह आंदोलन जिसमें ६०० से अधिक मंदिर, ६५ कृषि-समुदाय, ११० शाकाहारी भोजनालय, करोड़ों दर्शनार्थी, विश्व में वैष्णव साहित्य के सबसे बड़े प्रकाशक जिसने अबतक ५ करोड़ से अधिक पुस्तकें एवं पत्रिकाएं वितरित की हैं तथा अपने अन्नामृत योजना के अन्तर्गत प्रति दिन १२ लाख स्कूली बच्चों को भोजन कराते हैं।

गत वर्षों में श्रीमद भगवद गीता के उत्कृष्ट और शाश्वत सन्देश को विख्यात, तथा आध्यात्मिक समन्वय प्रसारित करने में इस्कॉन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि आज दर्जनों भाषाओं में भगवद-गीता प्रकाशित होकर वितरित हो रही हैं तो इसका श्रेय मुख्यतः इस्कॉन को ही जाता है । इस्कॉन के प्रयासों द्वारा विश्व भर में भगवान कृष्ण के शाश्वत ज्ञान को उजागर एवं प्रसारित करने के लिए मैं उन्हें शुभकामनायें देता हूँ । मैं कृष्णकृपामूर्ति ए सी भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद, जिन्होंने १९६६ में इस्कॉन की स्थापना की तथा जिनकी शिक्षाएं आज भी विश्व भर के कृष्ण भक्तों के ह्रदय में गुंजायमान है, के योगदान का भी नम्रतापूर्वक सम्मान करता हूँ ।

मैं इस्कॉन से सम्बंधित सभी लोगों को अपनी शुभकामनायें तथा बधाई प्रेषित करता हूँ एवं आशा करता हूँ की वे इसी प्रकार आगामी वर्षों में भी सर्वसामान्य जन की सेवा करते रहेंगे ।
— हस्ताक्षर–
(प्रणब मुख़र्जी)
नयी दिल्ली
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