क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ?

क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं ?

स्वतंत्रता या स्वाधीनता : सामान्य भाषा में, यह उस दशा का बोध कराती है जिसमें कोई राष्ट्र, देश या राज्य द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने पर किसी दूसरे व्यक्ति/ समाज/ देश का किसी प्रकार का प्रतिबन्ध या मनाही नहीं होती।

यदि किसी का जन्म एक राष्ट्र या राज्य की सीमा के अंदर हुआ है इसलिए वह वहां का निवासी कहलाया जाता है । इस सीमा में यदि कोई अतिक्रमण करे और अपने आदेश पालन करने पर विवश करे तो अप्रिय अवस्था लगती है ।
हम इसी अवस्था से छुटकारा पाने के लिए विविध प्रकार से संघर्ष करते हैं और स्वतंत्र होने पर आनंदित होते हैं ।
श्रील प्रभुपाद अपने गुरु महाराज से मिली शिक्षा के विषय में बताते हैं कि, किस प्रकार वे गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे और श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने उनसे कहा कि यह स्वतंत्रता नश्वर है और बुद्धिमान मनुष्य को यह जीवन शास्वत स्वतंत्रता के लिए उपयोग करना चाहिए ।
विदेशी व्यक्ति हमारी सीमा से बाहर चले भी जाएँ और यदि हम अपने मन, अपनी बुद्धि, अपनी इन्द्रियों के अधीन रह जाएँ तो यह वास्तविक स्वाधीनता नहीं कहलाती । यदि मन हमारे वश में नहीं होता तो हम उसके आदेशानुसार चलते हैं । यदि इन्द्रियां हमारे वश में नहीं होती तो अंततः उनके द्वारा निर्देशित होने के कारण भविष्य अंधकारमय ही होता है ।
तीन प्रकार के गुणों (सत्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण) से तो हम बंधे हुए हैं ही ।
वास्तविक स्वाधीनता तब होगी जब हम इन सभी द्वारा नियंत्रित न हों । इनके आदेशों का पालन करने के लिए विवश न हों । इनसे स्वतंत्र होने के लिए संघर्ष करें ।
जिस प्रकार हम विदेशी अतिक्रमण से छुटकारा पाकर आनंदित होते हैं और हर वर्ष इसे स्मरण करते हैं उसी प्रकार जब हम मन, इन्द्रियों, आदि के नियंत्रण से छुटकारा पाएंगे तो आनंद की अनुभव करेंगे ।
यह कैसे संभव है ?
जब हमें यह समझ आ जायेगा कि हम मात्र भौतिक पंचतत्त्वों से बना यह शरीर नहीं हैं अपितु आनंद के सागर, परमपुरुष भगवान के अंश हैं तो एक बालक की भाँती जो अपने पिता की उपस्तिथि में स्वतंत्रता का अनुभव करता है, वास्तविक आनंद का अनुभव कर पाएंगे ।
भगवान परम नियंता है, पूर्णरूप से स्वछंद हैं और उनके अंश होने के कारण जीव भी पूर्णरूप से स्वतंत्रता की इच्छा करता है और भौतिक परिस्थितियों से प्रभावित न होकर सदैव स्वछन्द रहना चाहता है । श्री चैतन्य महाप्रभु जीव की वास्तविक स्थिति के विषय में सनातन गोस्वामी को बताते हैं : जीवेर स्वरुप हय, कृष्णेर नित्य दास ।(चै च अादि २०।१०८-१०९)
यह तब संभव है जब हम (जीवात्मा), भगवान के सान्निध्य को स्वीकारें । उनकी सेवा द्वारा कृपा प्राप्त करने के उपरांत जीव को उन्ही के जैसे स्वच्छंदता की अनुभूति होगी ।
 सम्पूर्ण स्वतंत्रता हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है । जी हाँ, इस भौतिक संसार में सम्पूर्ण स्वतंत्रता तो सभी चाहते हैं, परन्तु किस से ?
जब हम यह जानने का प्रयास ही नहीं करेंगे कि हम प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से किसके द्वारा नियंत्रित हैं तब तक हमें वास्तविक आनंद की अनुभूति ही नहीं हो पायेगी और इसी प्रकार हम वर्ष में एक बार स्वतंत्रता मनाकर हर्षित होंगे और शेष वर्षभर परतन्त्र रहने के कारण दुखी रहेंगे ।