१९६६ में इस्कॉन के पंजीकरण की धाराओं में जो उद्देश्य उल्लिखित हैं वे श्रील प्रभुपाद की विचारधारा को उजागर करते हैं । इसके सात बिंदु हैं ।

7 Purposes

अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ के सात उद्देश्य

१. संपूर्ण मानव समाज में सुव्यवस्थित रूप से आध्यात्मिक ज्ञान का व्यापकता से प्रचार-प्रसार और सभी को आध्यात्मिक जीवन शैली से प्रशिक्षित करना जिससे उन्हें अपने जीवन-मूल्यों के असंतुलन की जानकारी हो ताकि विश्व में वास्तविक एकता और शांति की स्थापना हो सके ।

२. महान ग्रंथों जैसे, भगवद गीता और श्रीमद भागवतम, में प्रकाशित कृष्ण भावनामृत का प्रचार-प्रसार करना ।

३. संघ के सभी सदस्यों को आपस में एक साथ आदि पुरुष कृष्ण के निकट लाना, इस प्रकार सभी सदस्यों तथा संपूर्ण मानवता में यह विचार विकसित करना कि प्रत्येक जीव भगवान कृष्ण का गुणात्मक अंश हैं ।

४. भगवान चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं में प्रकाशित संकीर्तन आंदोलन, यानि भगवान के पवित्र नाम के सामूहिक जप एवं कीर्तन, को सिखाना एवं प्रोत्साहित करना ।

५. सदस्यों और संपूर्ण मानव समाज के लिए श्री कृष्ण को समर्पित दिव्य लीला स्थलों का निर्माण करना ।

६. सभी सदस्यों को सरलतम एवं अधिक सहज जीवन की शिक्षा देने के उद्देश्य से एक-दूसरे के अधिक निकट लाना ।

७. उपर्युक्त उद्देश्यों की प्राप्ति को ध्यान में रखते हुए, सामायिक पत्र, पत्रिकाओं,पुस्तकों और अन्य रचनाओं को प्रकाशित एवं वितरित करना ।

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चार्टर में पहला उद्देश्य प्रचार है । प्रचार एक ऐसा शब्द है जिसका उल्लेख श्रील प्रभुपाद बार-बार करते थे । उनके लिए प्रचार का अर्थ मात्र धर्मोपदेश का प्रचार नहीं था । जिस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु की ने दक्षिण-भारत की यात्रा के समय जन-जन को भावावेश में आकर हरिनाम संकीर्तन और नृत्य के लिए प्रेरित किया था उसी प्रकार श्रील प्रभुपाद सम्पूर्ण विश्व में हरिनाम संकीर्तन का प्रचार प्रसार करना चाहते थे ।

ऐसा नहीं था कि सन १९६६ एक नए धर्म का जन्म हुआ था बल्कि भगवान के शुद्ध नामों के नित्य प्रचार यानि हरिनाम संकीर्तन के पौधे को को पश्चिमी देशों में प्रतिरोपित किया गया था ।

इसका उद्देश्य यह भी था कि संघ के सदस्य स्वयं भी भगवद-गीता एवं श्रीमद भागवतम की शिक्षाओं का अपने जीवन में पालन करें, हरे कृष्ण महामंत्र का जप एवं कीर्तन करें तथा अपनी वास्तविक स्थिति यानि कि वे जीवात्मा हैं और परम भगवान श्री कृष्ण के अंश हैं, की अनुभूति करें ।

इन्ही अनुभूतियों को और अधिक प्रगाढ़ करने के लिए भगवान श्री कृष्ण को समर्पित लीला स्थलियों का निर्माण भी करें ताकि वहां जाकर भगवान की लीलाओं का स्मरण हो सके ।

श्रील प्रभुपाद चाहते थे कि इस्कॉन एक सरल एवं सहज जीवन-पद्धति का आदर्श स्थापित करे । वे भारतीय गाँवों के जीवन का उदाहरण देते थे जहाँ पर लोग ठीक वैसा ही जीवन बिताते हैं जैसा भगवान कृष्ण ने बिताया था । उनके विचार से ऐसी जीवन-पद्धति कृष्णभावनामृत के विकास के लिए सर्वथा अनुकूल थी ।

इन सभी छह उद्देश्यों की पूर्ति सातवें उद्देश्य से होती है : इस्कॉन सभी शिक्षाओं का पालन करने के साथ साथ साहित्य प्रकाशित तथा वितरित करेगा । यह बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि श्रील प्रभुपाद के गुरु श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने उन्हें यह आदेश दिया था कि, “जब भी तुम्हें धन प्राप्त हो, उस से पुस्तकें प्रकाशित करना ।”