बालक प्रह्लाद अपने सहपाठियों को शिक्षा देते हुए

बालक प्रह्लाद अपने सहपाठियों को शिक्षा देते हुए

भगवान श्री कृष्ण के असंख्य लीला अवतारों में, भक्तवत्सल भगवान् श्री नृसिंह सबसे अधिक विख्यात हैं । श्रीमद भागवतम के सातवें स्कन्ध में इस लीला के विषय में जानकारी मिलती है ।
नृसिंह अर्थात जो आधे नर और आधे सिंह शरीर में प्रकट हुए हैं ।
श्री नृसिंहदेव का प्राकट्य अपने अनन्य बाल-भक्त, प्रह्लाद की उनके असुर पिता हिरण्यकशिपु से रक्षा करने के लिए हुआ था ।
बालक प्रह्लाद के पिता, हिरण्यकशिपु अत्यन्त अहंकारी, त्रिलोक विजयी असुर था जो भगवान् विष्णु से द्वेषभावना रखता था ।
परन्तु हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवान् विष्णु का अनन्य भक्त था इसलिए अहंकार एवं द्वेष के कारण हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को कई बार प्राण घातक यातनाएं दीं ।
पिता हिरण्यकशिपु द्वारा प्रह्लाद को प्रताड़ना

पिता हिरण्यकशिपु द्वारा प्रह्लाद को प्रताड़ना

भक्त प्रह्लाद को मदमस्त हाथियों के पैरों तले रौंदने के लिए छोड़ा गया, विषैले सर्पों से संक्रमित कोठरी में रख गया, ऊँचे पर्वत से नीचे फेंका गया तथा कई अन्य प्रकार से डराने एवं धमकाने का प्रयास किया परन्तु वह हर बार भगवान् के नाम गाता हुआ सुरक्षित लौट आता था ।
हिरण्यकशिपु को यह बिलकुल सहन नहीं हुआ । कई बार हत्या करने के प्रयास में विफलता से क्षुब्ध होकर हिरण्यकशिपु को लगा कि यह बालक भगवान् विष्णु द्वारा संरक्षित है । पूछने पर कि क्या विष्णु हर स्थान पर उसकी रक्षा करते हैं, भक्त प्रह्लाद ने “हाँ” में उत्तर दिया । इसपर हिरण्यकशिपु और क्षुब्ध हो गया और पूछा कि क्या विष्णु इस खम्बे में भी हैं ? प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “जी हाँ, वे हर जगह हैं ।”
हिरण्यकशिपु ने अत्यन्त क्रोधित होते हुए खम्बे पर प्रचण्ड प्रहार किया, परिणामस्वरूप तत्काल खम्बा टूट गया और भगवान् श्री नृसिंह देव का उग्र रूप में प्राकट्य हुआ ।
हिरण्यकशिपु को लगा कि अन्य प्रतिद्वन्धियों जैसे वह नृसिंह देव को भी हरा देगा और भयंकर रूप से उनपर टूट पड़ा । कुछ देर उस से लड़ने के बाद भगवान् श्री नृसिंह ने उसको राजभवन के दरवाजे की चौखट पर अपनी गोद में लिटाया और अपने तीखे नाखूनों से उस असुर का पेट चीर डाला ।
हिरण्यकशिपु की अंतड़ियां एवं रक्त चारों ओर फैल गए तथा भगवान् नृसिंह एक सिंह की भांति विजयी गर्जना करने लगे । उनके मुखारविंद से तेज निकल रहा था तथा क्रोध भयावह था । किसी में उनके सम्मुख आने का साहस नहीं था परन्तु कोमल बालक प्रह्लाद प्रसन्नचित्त, पुष्पमाला लेकर भगवान् नृसिंह के निकट गया । भगवान् नृसिंह का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने अपने भक्त प्रह्लाद को उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया ।
इस प्रकार ब्रह्माजी द्वारा दिए गए वरदान का सम्मान करते हुए भगवान् नृसिंह ने हिरण्यकशिपु को समाप्त कर दिया ।
भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु वध

भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु वध

हिरण्यकशिपु किसी मनुष्य अथवा पशु द्वारा नहीं मारा गया परन्तु स्वयं भगवान् ने आधे नर एवं आधे सिंह के रूप में आकर उसे मारा । भगवान् ने उसे न धरती पर और न आकाश में परन्तु अपनी जंघा पर लिटा कर मारा । वह न तो घर के अंदर मरा और न ही बाहर उसे राजभवन के चौखट पर मारा गया । उस समय न दिन था न रात थी, हिरण्यकशिपु के प्राण त्यागने के समय संध्या की बेला थी । वह न तो किसी अस्त्र से मरा और न ही किसी शस्त्र से, वह अंततः भगवान् नृसिंह के वज्र समान नाखूनों से मारा गया ।
यद्यपि भगवान्, हिरण्यकशिपु जैसे असुर का वध करने हेतु इन वरदानों का सम्मान करने के लिए बाध्य नहीं हैं परन्तु फिर भी अपने भक्तों के शब्दों को प्रतिष्ठा बनाए रखने हेतु भगवान् कुछ भी कर सकते हैं ।
आश्चर्यजनक ढंग से भगवान् नृसिंह सर्वप्रिय अवतारों में एक हैं । यह विशेष लीला भगवान् की भक्तवत्सलता को दर्शाता है । भगवान् नृसिंह देव श्यामवर्ण भगवान् श्री कृष्ण से अभिन्न हैं और उनके इन शब्दों की पुष्टि करते है कि उनके शुद्ध भक्तों का कभी नाश नहीं होता ।
यह दिन भक्तों के लिए बहुत ही विशेष होता है । इस दिन भक्त उपवास करते हैं और पूजा, अभिषेक तथा हरिनाम संकीर्तन भी करते हैं ।