Vrindavan beauty

भगवान श्री कृष्ण अपनी लीलाओं द्वारा भक्तों को आनंद प्रदान करते हैं तथा असुरों का नाश भी करते हैं । हमारे आचार्य बहुत ही सुन्दर ढंग से भक्ति में अवरोध उत्पन्न करने वाले अनर्थों की तुलना इन असुरों से करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार यदि हम भगवान को आत्मसमर्पण कर देंगे तो वे इन असुर रूपी अनर्थों से हमें मुक्ति देंगे ।

श्रील भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा रचित श्री चैतन्य शिक्षमृत में वे वर्णन करते हैं कि भगवान के वृन्दावन लीला के समय मारे गए असुर, विभिन्न प्रकार के अनर्थों का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

१. पूतना – पाखंडी गुरु।

२. शकटासुर – छकड़ा-गाड़ी भरकर हमारी पुरानी एवं नयी बुरी आदतें, आलस्य तथा ईर्ष्या ।

३. तृणावर्त – भौतिक-विद्या में पांडित्य से उपजा अहंकार जो मनोकल्पित ज्ञान का कारण बनता है ।

४. नलकुवर तथा मणिग्रीव – प्रतिष्ठा से जनित अहंकार जो धन के कारण पागलपन पर आधारित है।

५. वत्सासुर – बालकों जैसी लालची मानसिकता जो दुष्ट-बुद्धि का कारण बनती है ।
६. बकासुर – कपट-धूर्तता और झूठ से परिपूर्ण व्यवहार ।
 ७. अघासुर – निर्दयी एवं हिंसक व्यवहार ।

८. ब्रह्म-विमोहन लीला – सांसारिक क्रियाकलाप तथा मनोकल्पित विद्वत्ता ।

९. धेनुकासुर – सांसांरिक बुद्धि एवं आध्यात्मिक ज्ञान से अनभिज्ञता ।१०. कालिया दमन –  निर्दयता एवं छल-कपट ।

 ११. दावाग्नि पान – वैष्णवों में अंतर-सांप्रदायिक मतभेद ।

१२. प्रलम्बासुर – काम, व्यक्तिगत लाभ तथा प्रतिष्ठा की इच्छा ।

१३. याज्ञीक ब्राह्मण – वर्णाश्रम के अंतर्गत अपने पद जनित दम्भ के कारण भगवान कृष्ण की उपेक्षा करना ।

१४. इंद्र का अभिमान-भंग – देवी-देवताओं की पूजा तथा यह सोचना कि, “मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ ।”

१५. नन्द-महाराज का वरुण-देव द्वारा बंदी बनाया जाना – यह सोचना कि उन्मत्तता द्वारा आध्यात्मिक जीवन में प्रगति होगी ।

१६. नन्द महाराज का विद्याधर नमक सर्प द्वारा निगला जाना – कृष्ण-भावनामृत के सत्य को मायावाद द्वारा आच्छादित होने से बचाना ।

१७. शंखचूड़ – भक्ति के वेश में नाम एवं प्रसिद्धि तथा इन्द्रिय-भोग की इच्छा ।

१८. अरिष्ठासुर – कपटियों द्वारा मनगढंत विधर्म में लिप्त होने से उपजे अहंकार के कारण भक्ति की उपेक्षा करना ।

१९. केशी दानव – यह धारणा कि, “मैं एक महान भक्त और गुरु हूँ ।”

२०. व्योमासुर – चोरों,धूर्तों तथा ऐसे लोगों का संग करना जो स्वयं को अवतार के रूप में प्रस्तुत करते हैं ।

श्रील भक्तिविनोद ठाकुर बताते हैं : “जो भक्त पवित्र हरिनाम की आराधना करते हैं उन्हें भगवान से पहले यह याचना करनी चाहिए कि वे इन सभी प्रतिकूल प्रवृत्तियों से छुटकारा दिलाएं – और उन्हें भगवान हरि के समक्ष यह प्रार्थना प्रतिदिन करनी चाहिए । अंततः निरंतर यह प्रार्थना करने से भक्तों का हृदय शुद्ध हो जाता है । भगवान श्री कृष्ण ने हृदय-क्षेत्र में उदित कई असुरों का वध किया है – अतएव इन सभी समस्याओं को नष्ट करने हेतु एक भक्त को दीनता से भगवान के समक्ष क्रंदन करना (रोना) चाहिए – तब भगवान सभी मलिनताओं को प्रभावहीन कर देंगे ।

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की ओर से आप सभी को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें