Mercy of Guru

गुरु ने ‘कारुण्य’ प्राप्त किया है । ‘कारुण्य’ अर्थात जैसे मेघ, सागर से जल प्राप्त करता है वैसे ही गुरु, आनंद के सागर, श्री कृष्ण से करुणामय मेघ प्राप्त करते हैं । घनाघनत्वं
और केवल मेघ ही हैं जो संसार के दावानल (जंगल में लगी आग) को बुझा सकते हैं । कोई और जल देने के उपाय इसमें सहायता नहीं कर सकते । यह असम्भव है । नाही आप वहां जा सकते हैं और नाही किसी अग्निशमन वाहन या बाल्टी द्वारा कोई सेवा कर सकते हैं । तो यह अग्नि कैसे बुझेगी ?
घनाघनत्वं । यदि आकाश में मेघ हों और यदि वर्षा होती है तो विस्तृत वन में लगी अग्नि तुरंत ही बुझाई जा सकती है । तो कदाचित आध्यात्मिक गुरु ही वह मेघ हैं । वे जल डालते हैं ।
वे जल डालते हैं । श्रवण-कीर्तन-जले करये सेचन (चै च १९.१५२) ।
वह जल क्या है ? ये श्रवण-कीर्तन ही वह जल है । भव-महा-दावाग्नि, यह भौतिक-जीवन रूपी दावाग्नि, निरंतर प्रज्वलित हो रही है । अतएव आपको इसे मेघ जनित वर्षा द्वारा बुझाना है और वर्षा अर्थात श्रवण-कीर्तन । श्रवण अर्थात सुनना और कीर्तन अर्थात जप करना । यही एकमात्र उपाय है ।
श्रवण-कीर्तन-जले करये सेचन

– श्रील प्रभुपाद प्रवचन,
१४ जनवरी १९७५, मुम्बई